बरसों से बिना बात जिससे रूठा रहा, उस मुस्कराहट को
खींच कर होठों पे लाने की ये कोशिश है

सम्मान मैं इतने झुके कि कायरी का भरम देने लगे
उस सर को, इज्ज़त से उठाने की ये कोशिश है

बरसों बंधा पड़ा था कई अँधेरे धोखों मैं,
उस इंसान को रौशनी मैं लाने कि ये कोशिश है

जिन हाथों पे भरोसा था तुम्हारा जाने को,
उन हाथों का जादू दिखाने की ये कोशिश है

– राहुल कात्यायन

मैं जानता हूँ कि इस घुप अंधेरे के पीछे कहीं मेरा सूरज छिपा है
बस अभी आजाएगा रौशनी फैलाते हुए

मुझे मालुम है कि इस तपते रेगिस्तान के पास कहीं, एक नदी का हरा भरा किनारा है
बस अभी महसूस होगा, हवाएं ठंडी बहाते हुए

मेरे ये हताश, निराश कदम एक छलावा हैं खुद मेरे ही लिए
मैं पाया था खुदको, कल अपनी ही हंसी बनाते हुए