आज़ादी
सितम्बर 30, 2010

अपनों से आज़ादी, अपनों के सपनों से आज़ादी
खुली धूप मैं जलने की आज़ादी, तपती ज़मीं पर नंगे पाँव चलने की आज़ादी
सपने पूरे करने की आज़ादी, सपने देखते देखते मरने की आज़ादी
झूठी शान से आज़ादी, समाज मैं सामाजिक होने से आज़ादी
अपने को सामाजिक मीटर से नापने की आज़ादी
ब्रांड्स की धूम से आज़ादी, क्रेडिट कार्ड्स के बूम से से आज़ादी
बिकते हुए भगवानों से आज़ादी, खुद के भीतर छिपे शैतानों से आज़ादी,
ओह ओह , हर जगह तो क़ैद हूँ मैं,
मुझे आज़ादी चाहिए





सितम्बर 30, 2010 at 12:27 पूर्वाह्न
what a beautiful way to express the internal struggle!