अँधेरे

सितम्बर 29, 2010

अरे सुबह
कुछ तो शर्म कर
उजाला ला, हौसला दे, मंजिल दिखा
मैंने पूजा तुझे बरसों, बिन बात भरोसा किया
अंधेरों से लड़ा, उजाला ले ले कर फिरा
पर तू है की मानती नहीं
सब कुछ पता है, लेकिन ऐसे करती है कि जानती नहीं

सुबह  का सूरज तो हर जागने वाले का हक होता है
तो फिर मैं मुट्ठी भर उजाले के इंतज़ार मैं क्यूँ बैठा हूँ
शायद , तुम्हे हंसी आती है मुझे तरसा तरसा कर
शायद , मेरे जैसे सुबह के पुजारी तुम्हें कम ही मिलते हैं
तुम्हे लगता है के ये यूँ ही ऐसे ही मरता गिरता रहे
और मेरी उम्मीद मैं मेरी पूजा करता रहे

लेकिन , तुम्हे एक बात बता दूँ
उजाले मेरी पसंद हैं, मजबूरी नहीं
सच तो ये है के मैं पैदा ही हुआ अंधेरो से, पला भी अंधेरो मैं
अँधेरा ही खा कर उजाला बनाया, अँधेरा ले कर उजाला फैलाया,  हाँ, मुट्ठी भर ही सही
सच तो ये है कि मैं अंधेरो का खिलाडी हूँ
अँधेरे मैं मुझे सब कुछ साफ़ साफ़ नज़र आता है
अँधेरा मुझे  असलियत बताता है , क्यूंकि अँधेरे मैं सब का नकाब उतर जाता है

धमकी नहीं है, लेकिन मैं भी सोच कर डर जाता हूँ
कहीं मैं अपनी पसंद बदल न दूँ
मुझे हाथ फैलाए खड़े हैं अँधेरे , वो देखो
कहते है कि तुम शासक हो  हमारे, ऊपर बैठो
राज करो, और फैलाओ अँधेरे का साम्राज्य
क्यूंकि अँधेरा ही आखिरी सच्चाई है
इंसान जब भी उजालो से थक कर भागेगा,
या उजालो का इंतज़ार करते करते हारेगा
वो अँधेरा ही है जो उसे संभालेगा

मत करो इंतज़ार सुबह का , जो कतरा भर उजाला भी दे न पाई तुम्हे
अंधेरो कि शरण ले लो क्यूंकि ये ही आखरी मंजिल

अरे सुबह
कुछ तो शर्म कर

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