छिपा हुआ सत्य – राहुल कात्यायन
फ़रवरी 2, 2009
दोस्तों, मैं एक पेड हूँ. नीम का एक विशाल पेड़. कई साल से यहाँ खडा रहने के बावजूद एक लम्बा सफर तय कर चुका हूँ. सही, सही तो उम्र का पता नहीं लेकिन वो बूढा जो मेरी छाया मैं टूटी खाट पर लेटा है, उससे करीब दस साल छोटा हूँ. आज मौसम ठीक नहीं है. बहुत तेज़ हवा चल रही है. मेरी टहनियों पर बने घोंसलों मैं बसेरा बनाने वाले पक्षी शायद डर रहे हैं. क्यों न डरें, कुछ भी तो हो सकता है इस आंधी तूफ़ान में.
इसी तरह की एक आंधी बहुत दूर से मुझे उड़ाती हुई यहाँ लायी थी. कितना डरा सहमा हुआ था मैं. होता भी क्यों नहीं, आखिर मैं था ही क्या. एक छोटा सा निरीह बीज. जिन्दगी कब ख़त्म हो जायेगी, इसका पता नहीं था मुझे. लेकिन फिर भी मन मैं एक इच्छा थी, जीने की इच्छा. पता नहीं क्यों, मुझे अहसास होता था कि मेरे अन्दर कुछ है जो बाहर आना चाहता है.
ईश्वर बहादुरों का साथ देता है !
सबसे पहले दोस्ती हाथ बडे मिटटी ने. अपने सीने से मुझे इस तरह लगाया जैसे माँ अपने बच्चे को चिपकाती है. मैंने देखा कि मेरे ऊपर कि परत खुल रही है और कुछ ही दिनों में मैं अंकुरित हो उठा.
बीज से पोधा बनने वालों मैं केवल मैं ही नहीं था. मेरे कई दोस्त भी मेरे आस पास थे. एक दिन हादसा हुआ. पास रहने वाली पालतू बकरी मेरे तीन दोस्तों को हज़म कर गयी. सारी रात मैं सो नहीं सका. लगता था कि मिटटी मैं मिलने और अंकुरित होने की सारी मेहनत बेकार गयी. सारी रात मैं ईश्वर से प्रार्थना करता रहा- ” हे ईश्वर, मैं जीना चाहता हूँ, विशाल बनना चाहता हूँ, अपनी छाया मैं लोगों की थकान दूर करना चाहता हूँ, अपने गुणों को बांटना चाहता हूँ.”
ईश्वर ने प्रार्थना सुनी और अगली सुबह चमत्कार हुआ. दस साल का एक लड़का मेरे पास आया और बहुत प्यार से मेरी तरफ देखने लगा. देखते देखते उसने मेरे चारों ओर ईंटो का घेरा बना दिया. ईश्वर ने मेरी रक्षा के लिए उसे भेजा होगा.
अब मैं चैन से रह सकता था.
दोस्तों, मेरी छाया मैं लेटा ये खांसता हुआ बूढा वही दस साल का बच्चा है. जब ये मेरी छाया मे लेटता है तो मेरे दिल को एक महान प्रसन्नता होती है.
हाँ, तो मैं ये कह रहा था की ईंट का घेरा लगने के बाद मुझे किसी बड़ी समस्या का सामना नहीं करना पड़ा. थोडा बहुत पतझड़ - सावन, गर्मी- सर्दी तो लगा ही रहता है.
आज मुझे अपनी विशालता पर गर्व है. मुझे डराने वाले भेंड़ बकरियां अब मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकतीं. और तो और, कई बार उन बददिमाग जानवरों को मेरे मजबूत तने से बाँध दिया जाता है. जब वे अपने मजबूत सर को बेबसी से मेरे तने पर रगड़ते हैं तो लगता है जैसे अपनी पुराणी धृष्टता पर पश्चाताप कररहे हैं.
मुझे याद आता है वो दिन जब मैं मिटटी मैं मिला था. मेरे साथ के कई बीजों ने मिटटी का आमंत्रण स्वीकार नहीं किया और अपनी कड़ी खाल के साथ दम तोड़ दिया. दोस्तों, नयी शक्ति के विकास के लिए पुराणी कड़ी परतों को तोड़ना ही पड़ता है.
आज कितनी ख़ुशी मिलती है मुझे – जब वैद्यराज औषध के लिए मेरी तःनिहिया ले जाते हैं. जब मेरी सूखी लकड़ियों से घरों के चूल्हे जलते है. हाँ ईश्वर, हाँ! यही चाहता था मैं.
मुझे मालुम है की मेरे दोस्त की तरह मैं भी बूढ़ा हो चला हूँ और एक दिन फिर से मिटटी मे मिल जाऊँगा लेकिन मैं मरूँगा नहीं.
किसी महात्मा के उपदेश और कवि ही ह्रदयस्पर्शी कविता की तरह मेरे बीज भी दूर दूर तक फैल चुके हैं और अंकुरित भी हो चुके हैं मैं फिर से जीयूंगा, मैं उनके अन्दर जीयूंगा क्योंकि सत्य कभी मरता नहीं है.






मई 6, 2009 at 12:39 अपराह्न
ब्लॉग जगत में आपका स्वागत है. हमारी शुभकामनायें. हम मनुष्यों को पदों से सीख लेनी चाहिए.
मई 6, 2009 at 1:00 अपराह्न
आपकी टिप्पणी के लिए बहुत बहुत धन्यवाद, थोडा बहत ब्लॉग तो पहले से लिख रहा हूँ लेकिन पता नहीं था
कि हिंदी मैं भी लिखने की सुविधा है. बहुत अच्छा लग रहा है.
मई 7, 2009 at 2:08 पूर्वाह्न
सुन्दर! आपकी आशावादिता मन को खुश कर गयी। हिंदी में लिखते रहें अच्छा लगेगा।
मई 7, 2009 at 2:25 पूर्वाह्न
धन्यवाद , अनूप जी. ये रचना करीब १४ साल पुरानी है लेकिन कहानी अभी भी बाकी है. जिंदगी के कई सारे सत्य बहुत बाद मैं उजागर होते हैं.
मई 7, 2009 at 7:25 पूर्वाह्न
अच्छा लगा !!
आपके चिट्ठे पर आकर!!
इसी तरह हिन्दी में श्रीवृद्धि करते रहें!!
प्राइमरी का मास्टर
फतेहपुर
मई 7, 2009 at 11:08 पूर्वाह्न
धन्यवाद, प्रवीण जी. लिखता रहूँगा, वैसे आप भी बहुत अच्छा लिखते हैं….
मई 7, 2009 at 12:01 अपराह्न
आपका ब्लॉग पढ़ा.
बहुत achcha laga. is trah ki marmik kahani ki utaptti kahan se hui hogi ye to andaza lagana kathin hai.
hann par main itana zaroor kah sakti hoon ki aap ek bahot ho uchch koti ki lekhani se abhibhoot hai.
Isi trah se apni lekhani ko post karte rahiye jo hame bhi nai disha ko sujha de.
Hardik shubhkamnaaye.
सुलाख्चना
शुक्ला
मई 7, 2009 at 12:09 अपराह्न
आपके सुन्दर शब्दों से पता चलता है कि आप का मन भी सुन्दर हैं.
कृपया ऐसे ही उत्साह- वर्धन करते रहिये.
राहुल कात्यायन