आज़ादी
सितम्बर 30, 2010

अपनों से आज़ादी, अपनों के सपनों से आज़ादी
खुली धूप मैं जलने की आज़ादी, तपती ज़मीं पर नंगे पाँव चलने की आज़ादी
सपने पूरे करने की आज़ादी, सपने देखते देखते मरने की आज़ादी
झूठी शान से आज़ादी, समाज मैं सामाजिक होने से आज़ादी
अपने को सामाजिक मीटर से नापने की आज़ादी
ब्रांड्स की धूम से आज़ादी, क्रेडिट कार्ड्स के बूम से से आज़ादी
बिकते हुए भगवानों से आज़ादी, खुद के भीतर छिपे शैतानों से आज़ादी,
ओह ओह , हर जगह तो क़ैद हूँ मैं,
मुझे आज़ादी चाहिए
अँधेरे
सितम्बर 29, 2010

अरे सुबह
कुछ तो शर्म कर
उजाला ला, हौसला दे, मंजिल दिखा
मैंने पूजा तुझे बरसों, बिन बात भरोसा किया
अंधेरों से लड़ा, उजाला ले ले कर फिरा
पर तू है की मानती नहीं
सब कुछ पता है, लेकिन ऐसे करती है कि जानती नहीं
सुबह का सूरज तो हर जागने वाले का हक होता है
तो फिर मैं मुट्ठी भर उजाले के इंतज़ार मैं क्यूँ बैठा हूँ
शायद , तुम्हे हंसी आती है मुझे तरसा तरसा कर
शायद , मेरे जैसे सुबह के पुजारी तुम्हें कम ही मिलते हैं
तुम्हे लगता है के ये यूँ ही ऐसे ही मरता गिरता रहे
और मेरी उम्मीद मैं मेरी पूजा करता रहे
लेकिन , तुम्हे एक बात बता दूँ
उजाले मेरी पसंद हैं, मजबूरी नहीं
सच तो ये है के मैं पैदा ही हुआ अंधेरो से, पला भी अंधेरो मैं
अँधेरा ही खा कर उजाला बनाया, अँधेरा ले कर उजाला फैलाया, हाँ, मुट्ठी भर ही सही
सच तो ये है कि मैं अंधेरो का खिलाडी हूँ
अँधेरे मैं मुझे सब कुछ साफ़ साफ़ नज़र आता है
अँधेरा मुझे असलियत बताता है , क्यूंकि अँधेरे मैं सब का नकाब उतर जाता है
धमकी नहीं है, लेकिन मैं भी सोच कर डर जाता हूँ
कहीं मैं अपनी पसंद बदल न दूँ
मुझे हाथ फैलाए खड़े हैं अँधेरे , वो देखो
कहते है कि तुम शासक हो हमारे, ऊपर बैठो
राज करो, और फैलाओ अँधेरे का साम्राज्य
क्यूंकि अँधेरा ही आखिरी सच्चाई है
इंसान जब भी उजालो से थक कर भागेगा,
या उजालो का इंतज़ार करते करते हारेगा
वो अँधेरा ही है जो उसे संभालेगा
मत करो इंतज़ार सुबह का , जो कतरा भर उजाला भी दे न पाई तुम्हे
अंधेरो कि शरण ले लो क्यूंकि ये ही आखरी मंजिल
अरे सुबह
कुछ तो शर्म कर
पहला शेर – राहुल कात्यायन
नवम्बर 6, 2009
मैं क्यों हारूँगा किस्मत से
जबकि मुझे ये ऐतबार है
मेरी हर हार मैं छिपी
खुदा तेरी भी हार है
कोशिश – राहुल कात्यायन
अक्टूबर 25, 2009
बरसों से बिना बात जिससे रूठा रहा, उस मुस्कराहट को
खींच कर होठों पे लाने की ये कोशिश है
सम्मान मैं इतने झुके कि कायरी का भरम देने लगे
उस सर को, इज्ज़त से उठाने की ये कोशिश है
बरसों बंधा पड़ा था कई अँधेरे धोखों मैं,
उस इंसान को रौशनी मैं लाने कि ये कोशिश है
जिन हाथों पे भरोसा था तुम्हारा जाने को,
उन हाथों का जादू दिखाने की ये कोशिश है
– राहुल कात्यायन
संघर्ष और जिद
मई 6, 2009
मैं जानता हूँ कि इस घुप अंधेरे के पीछे कहीं मेरा सूरज छिपा है
बस अभी आजाएगा रौशनी फैलाते हुए
मुझे मालुम है कि इस तपते रेगिस्तान के पास कहीं, एक नदी का हरा भरा किनारा है
बस अभी महसूस होगा, हवाएं ठंडी बहाते हुए
मेरे ये हताश, निराश कदम एक छलावा हैं खुद मेरे ही लिए
मैं पाया था खुदको, कल अपनी ही हंसी बनाते हुए
छिपा हुआ सत्य – राहुल कात्यायन
फ़रवरी 2, 2009
दोस्तों, मैं एक पेड हूँ. नीम का एक विशाल पेड़. कई साल से यहाँ खडा रहने के बावजूद एक लम्बा सफर तय कर चुका हूँ. सही, सही तो उम्र का पता नहीं लेकिन वो बूढा जो मेरी छाया मैं टूटी खाट पर लेटा है, उससे करीब दस साल छोटा हूँ. आज मौसम ठीक नहीं है. बहुत तेज़ हवा चल रही है. मेरी टहनियों पर बने घोंसलों मैं बसेरा बनाने वाले पक्षी शायद डर रहे हैं. क्यों न डरें, कुछ भी तो हो सकता है इस आंधी तूफ़ान में.
इसी तरह की एक आंधी बहुत दूर से मुझे उड़ाती हुई यहाँ लायी थी. कितना डरा सहमा हुआ था मैं. होता भी क्यों नहीं, आखिर मैं था ही क्या. एक छोटा सा निरीह बीज. जिन्दगी कब ख़त्म हो जायेगी, इसका पता नहीं था मुझे. लेकिन फिर भी मन मैं एक इच्छा थी, जीने की इच्छा. पता नहीं क्यों, मुझे अहसास होता था कि मेरे अन्दर कुछ है जो बाहर आना चाहता है.
ईश्वर बहादुरों का साथ देता है !
सबसे पहले दोस्ती हाथ बडे मिटटी ने. अपने सीने से मुझे इस तरह लगाया जैसे माँ अपने बच्चे को चिपकाती है. मैंने देखा कि मेरे ऊपर कि परत खुल रही है और कुछ ही दिनों में मैं अंकुरित हो उठा.
बीज से पोधा बनने वालों मैं केवल मैं ही नहीं था. मेरे कई दोस्त भी मेरे आस पास थे. एक दिन हादसा हुआ. पास रहने वाली पालतू बकरी मेरे तीन दोस्तों को हज़म कर गयी. सारी रात मैं सो नहीं सका. लगता था कि मिटटी मैं मिलने और अंकुरित होने की सारी मेहनत बेकार गयी. सारी रात मैं ईश्वर से प्रार्थना करता रहा- ” हे ईश्वर, मैं जीना चाहता हूँ, विशाल बनना चाहता हूँ, अपनी छाया मैं लोगों की थकान दूर करना चाहता हूँ, अपने गुणों को बांटना चाहता हूँ.”
ईश्वर ने प्रार्थना सुनी और अगली सुबह चमत्कार हुआ. दस साल का एक लड़का मेरे पास आया और बहुत प्यार से मेरी तरफ देखने लगा. देखते देखते उसने मेरे चारों ओर ईंटो का घेरा बना दिया. ईश्वर ने मेरी रक्षा के लिए उसे भेजा होगा.
अब मैं चैन से रह सकता था.
दोस्तों, मेरी छाया मैं लेटा ये खांसता हुआ बूढा वही दस साल का बच्चा है. जब ये मेरी छाया मे लेटता है तो मेरे दिल को एक महान प्रसन्नता होती है.
हाँ, तो मैं ये कह रहा था की ईंट का घेरा लगने के बाद मुझे किसी बड़ी समस्या का सामना नहीं करना पड़ा. थोडा बहुत पतझड़ - सावन, गर्मी- सर्दी तो लगा ही रहता है.
आज मुझे अपनी विशालता पर गर्व है. मुझे डराने वाले भेंड़ बकरियां अब मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकतीं. और तो और, कई बार उन बददिमाग जानवरों को मेरे मजबूत तने से बाँध दिया जाता है. जब वे अपने मजबूत सर को बेबसी से मेरे तने पर रगड़ते हैं तो लगता है जैसे अपनी पुराणी धृष्टता पर पश्चाताप कररहे हैं.
मुझे याद आता है वो दिन जब मैं मिटटी मैं मिला था. मेरे साथ के कई बीजों ने मिटटी का आमंत्रण स्वीकार नहीं किया और अपनी कड़ी खाल के साथ दम तोड़ दिया. दोस्तों, नयी शक्ति के विकास के लिए पुराणी कड़ी परतों को तोड़ना ही पड़ता है.
आज कितनी ख़ुशी मिलती है मुझे – जब वैद्यराज औषध के लिए मेरी तःनिहिया ले जाते हैं. जब मेरी सूखी लकड़ियों से घरों के चूल्हे जलते है. हाँ ईश्वर, हाँ! यही चाहता था मैं.
मुझे मालुम है की मेरे दोस्त की तरह मैं भी बूढ़ा हो चला हूँ और एक दिन फिर से मिटटी मे मिल जाऊँगा लेकिन मैं मरूँगा नहीं.
किसी महात्मा के उपदेश और कवि ही ह्रदयस्पर्शी कविता की तरह मेरे बीज भी दूर दूर तक फैल चुके हैं और अंकुरित भी हो चुके हैं मैं फिर से जीयूंगा, मैं उनके अन्दर जीयूंगा क्योंकि सत्य कभी मरता नहीं है.





